मेरे विघ्नहरता और मैं 

पिछले कुछ वर्षों से मेरी भी आस्था इस त्यौहार मे बढती जा रही है। जैसे ही पास के मंदिर मे गणपति जी को स्थापित करने का जुलूस धूमधाम से निकलता है तो मानो मेरे कदम खुद ब खुद उनकी तरफ खिचे चले जाते हैं। पूरे हर्ष उल्लास के साथ उसमें शामिल होती हूँ। सच मे जो भक्त भगवान की स्थापना मे व्यस्त होते हैं उनकी श्रद्धा और सहयोग देखकर मन भाव विभोर हो जाता है

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मेरी नानी की कहानी, मेरी मां की जु़बानी

आज भी मां की वो सीख याद है, “जीवन की कड़वी सच्चाईयों का सामना हिम्मत से करना चाहिए। जि़दगी तो चलती ही रहेगी। हिम्मत रखेंगे तो बड़ी से बड़ी जि़म्मेदारी भी निभा पाएंगे”। मुझे एक बात का एहसास भी हुआ कि मंजिल पर पहुंच कर ही थकान का एहसास होता है, और कहीं ना कहीं यह खुशी भी होती है कि हमने अपनी जि़म्मेदारियां अच्छे से निभाई।

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