Book Review: TumTak by Hemlata Bisht

Book Review: TumTak by Hemlata Bisht

 

I am super excited to be a part of this blog tour organized by Daisy.

As a part of this blog tour, I am writing the book review of the book “Tum Tak: Lucknow to Mumbai via Indore”.

This book is in Hindi and is currently the number 1 Best Seller on Amazon.

About the Author:

कथा जगत में यह कृति लेखिका हेमा बिष्ट का पहला क़दम है। पहले सॉफ्टवेयर इंजीनियर रह चुकी लेखिका फ़िलहाल मेलबर्न में रह कर अपने फोटोग्राफी और लेखन के शौक को जी रही हैं। अपने बारे में बताते हुए वे कहती हैं ‘‘जितना स्नेह और आत्मीयता इस दुनिया ने मेरे जीवन पर बरसाई है, उसके लिये मैं इसकी ऋणी हूँ। अपने लेखन से कुछ सुन्दरता और कुछ सकारात्मक यदि लौटा सकूँ, तो यह कोशिश मुझे ज़रूर करनी चाहिये। मेरे पास जो कुछ है, वो इसी दुनिया और आप सबसे मिला हुआ है। मैं इससे ज्यादा कहूँ कि मेरे लेखन में तेरा तुझको अर्पण वाला ही भाव प्रधान है।’’ लेखिका wordpress के इस पेज पर सक्रिय है: https://realizationblog.wordpress.com

About the Book:

The book provides a gripping tale based on the love story of Palash and Harsha. This madly in love with each other couple is too shy to confess about their love to each other.

The poetic language and the rhythmic descriptions touched my heart. The author has based the titles of every chapter on the titles of different Hindi songs making the reader feel the music in them.

The story develops slowly; the vivid descriptions provide the reader to view it. The characters are distinct and relatable. They grow as the story proceeds.

The story shows the narrator’s dilemma of choosing love marriage and her fears of going against her family’s wishes. It brings out the beauty of the relationship between a father and daughter.

Here is one of my favourite parts of the book:

जब पलाश से शादी की बात उनके सामने रखी गयी, तब पापा ने कहा- ‘बचपन से बहुत मार पिटाई की मैंने इसके साथ। आज यह कुछ माँग रही है। इसके पूरे जीवन का सवाल है। लड़का भले ही पंडित हो लेकिन इससे प्यार करता है। इसका ख़याल रखेगा। शादी के बाद मेरी बेटी ख़ुश रहेगी। पति की तरफ़ से कोई क्लेश नहीं होगा इसके जीवन में। बाकी तो इसका अपना भाग्य है।’ यह कहकर पापा ने माँ से कहा था- ‘उससे कह देना पापा को कोई ऐतराज़ नहीं है।’ मैंने बचपन से उनका कठोर रूप ही देखा था, मुझे यक़ीन नहीं हो पा रहा था कि इतनी कोमलता भी है मेरे पापा के दिल में। उस रात स्टेशन पर भी पापा मुझे पलाश के साथ छोड़कर चले गये। यह मेरे पापा ही थे! मैंने तो कभी उनका यह रूप सोचा ही नहीं था। उनके संघर्षों और उनके सपनों ने उनका वज्र रूप ही मुझे हमेशा दिखाया। मेरे पापा ने अपनी सारी मान्यतायें, सारी धारणायें, सारे ऐतराज़ किनारे करके मुझे अपना स्नेह भरा आशीर्वाद दे दिया। मैंने जो कभी सपने में भी नहीं सोचा था, वो सपना पापा ने कितनी आसानी से सच बनाकर मुझे सौंप दिया!

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