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मेरी नानी की कहानी, मेरी मां की जु़बानी

यह कहानी मेरी नहीं, मेरी मां की है। आज की

इस कहानी में जज़्बात भी उनके हैं, और अल्फाज़ भी उनके।

इसलिए इस कहानी में मैंने कोई बदलाव नहीं किए। उम्मीद करती हूँ, आपको पसंद आएगी :

मेरी शादी हुई तो मुझे मां बाप से बिछड़ने का बहुत दुख था पर सुकून था कि मैं उसी शहर में हूँ तो आती जाती रहूंगी। मेरे पिताजी की सेहत ठीक नहीं रहती थी। हालांकि वो नौकरी भी करते थे। अच्छी पोस्ट पर भी थे, मेरी शादी के बाद मुझसे मिलने भी आते थे, मेरा कोई काम होता तो अवश्य करते।

कभी कभी जब मैं अकेले होती तो यह सोच कर घबरा जाती थी कि मेरे पिताजी की तबियत ठीक नहीं रहती। उनके बहुत करीब थी। उनकी याद आखोँ में आँसु ले आती। कुछ साल बाद, उनकी

तबियत और बिगड़ने लगी। अब मैं बैठे बैठे डर जाती कि अगर मेरे पिताजी को कुछ हो गया तो? मुझे लगता था कि मेरी दुनिया वहीं रुक जाएगी। और फिर दिन ….वही हुआ…

मेरे पिताजी दफ्तर गए और वहां उनकी तबीयत खराब हुई। उन्हें जल्द अस्पताल ले जाना पड़ा। शाम को अस्पताल से खबर मिली कि पिताजी मां को याद कर रहे हैं। मां उनसे मिलने अस्पताल गई। जब घर लौटी तो बोली, “मैं खाली हाथ आ गई”। मुझे समझ नहीं आया। तब पता चला कि मां को देखते ही पिताजी ने आखिरी सांस ली और चल बसे।

अब तक तो कुछ समझ नहीं आया। ऐसा झटका लगा कि बुद्धि ने काम करना बन्द कर दिया, किन्तु पिताजी की तेरहवीं पर जब मैंने मां को सीड़ियों से उतरते देखा तो एक मिनट के लिए सांस ही रुक गई। मैंने अपनी मां को सफेद साड़ी में बिल्कुल सादे और शांत रूप में देखा। मुझे जीवन का सबसे बड़ा झटका लगा जब मैने अपनी मां को इस रुप मे देखा। तब असली एहसास हुआ कि पिताजी नहीं रहे। मैं रो रो कर बेहाल थी। बस चिल्लाई जा रही थी, “यह ठीक नहीं हुआ, यह ठीक नहीं हुआ”

उस वक्त मां ने ही मुझे सम्भाला, बोली “यही जीवन की सच्चाई है इसे जितनी जल्दी समझ लेंगे उतना ही हम लोगों के लिए अच्छा है”।

मैं अपनी मां का वो शांत रुप देख कर बिल्कुल स्तब्ध थी किन्तु मुझे शक्ति भी मिली। जीवन की सबसे कड़वी सच्चाई का मां ने इतने सहज रुप से स्वीकार किया। मुझे अपनी मां पर गर्व भी हो रहा था। मेरी मां स्कूल में अध्यापिका थी और हम पांच बहने। पिताजी की मृत्यु के समय दो की शादी हुई थी और बाकियो की होनी थी। एक छोटी बहन तो बहुत ही छोटी थी। शायद उनको देखकर मां ने संयम रखा होगा। मां ने हिम्मत के साथ मेरी दोनों छोटी बहनों को पढा लिखा कर उनका ब्याह किया। मुझे आज भी याद है, सबसे छोटी बहन के ब्याह के बाद मेरी मां पहली बार रोई थी कि सब मुझे छोड़ कर चले गए। उनका मतलब पिताजी से था। तब मुझे लगा कि मां ने कितने सालों तक वह दर्द अपने अन्दर छुपा कर रखा था ताकि उसकी बेटियाँ कमजो़र ना बनें।

आज भी मां की वो सीख याद है, “जीवन की कड़वी सच्चाईयों का सामना हिम्मत से करना चाहिए। जि़दगी तो चलती ही रहेगी। हिम्मत रखेंगे तो बड़ी से बड़ी जि़म्मेदारी भी निभा पाएंगे”। मुझे एक बात का एहसास भी हुआ कि मंजिल पर पहुंच कर ही थकान का एहसास होता है, और कहीं ना कहीं यह खुशी भी होती है कि हमने अपनी जि़म्मेदारियां अच्छे से निभाई।

यही है मां की सीख- तकलीफ मे घबराना नहीं चाहिए, हिम्मत से काम लेना चाहिए। सब समस्याएं समय के साथ हल हो जाती हैं।  

 

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Kids These Days Are Not Safe Anywhere, Here Is What You Can Do

 

It really makes me worried as a mother of two to read about the various incidents happening around with children. Earlier, we were allowed to play outside in the streets or in the parks all alone or with friends till very late in the evening. But now, we are too scared to let our children go alone anywhere. It’s sad and terrifying that incidents of rape with small kids are happening in school. Even schools are not a safe place for children these days.

Two years back, when we were on a house hunt, our most important criteria was to have our house which should be nearer to the school of our kids. When we shifted in the new locality, we had a sigh of relief that at last our kids’ school was at a walking distance from our house. I could manage to pick and drop my kids to their school by myself. Though, it is not easy these days to have a house which can be nearer to school, but if we can have then it is really a blessing. Sadly, even then we cannot ensure the safety of our kids fully with sad incidents happening in the school itself.

Here are a few tips to ensure the safety of our kids:

  1. Be open and frank with the child.

We should remain open and frank with our children. Children should feel free to come and tell us about anything without any kind of fear. They should feel free to come to us and tell us about anything and everything that they like. We should have an unbiased and encouraging atmosphere at home where kids find themselves comfortable to express themselves.

2. Educating a child about their own safety.

We must educate our children to be very careful and cautious. We must tell them that they should not talk to any strangers or get lured away by anyone. They should try to be with their friends and not wander away on their own. They should inform the teacher if they come across somebody they feel scared of.

3.The good touch and the bad touch

A very important thing for a child is to understand the difference between the good and the bad touch. They should learn about their private parts and should not expose them to anyone. If someone tries to approach them in indecent way, they should immediately inform their parents.

4. Having daily conversations

One more important thing is to have daily conversations with kids. Spend time with your kids as soon as they come from their school and let them tell you about their day at school. Listen to them patiently even if they talk about very little and unimportant things. It helps in building trust and the child feels important in front of you. That half an hour or one hour after school is very important for daily conversations as they are too excited to tell you about everything that happened in school.

5. Never leave your child unguarded or unattended

This is extremely important. These days, we cannot trust anyone. Kids are not safe at any place. Try to be with the kids as much as you can both physically and mentally. Leaving the child unattended or unguarded even for a minute is not good.

6. Observe the child

Children have terrible mood swings. But even then we should not dismiss any little change in their behaviour or let it go unnoticed. We must keep asking and enquiring the child about what bothers them or makes them uncomfortable.

We must also teach our kids to raise an alarm and not suppress themselves due to any kind of fear.

It is not possible to be with the kids all the times but it is possible to be there for them always. Our kids are the centre of our universe, we must do our best to ensure their safety and security in the best possible means.

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सास बहु कैसे बने सहेली, रिश्तों की सबसे बड़ी पहेली

सभी रिश्तों में सबसे उलझा एवं मुश्किल रिश्ता होता है सास बहु का। दो औरतें जब बहनें हों, मित्र हों, पार्क में रोज़ मिलती हों; एक प्यारा सा रिश्ता अकसर बनाने में सफल हो जाती हैं। पर न जाने क्यूँ जब वे सास बहु बनती हैं तो चाहते हुए भी वैसा रिश्ता नहीं बना पाती।

आज कल सास बहु का रिश्ता काफी बदल रहा है किन्तु अभी भी कहीं बहु के मन में और कहीं सास के मन में एक उम्मीद बनी रहती है कि काश हमारी बहु बेटी की तरह होती। कहते हैं कि ताली दोनों हाथों से बजती है, यह सच है। जब तक दोनों अपना हाथ आगे नहीं बढाएंगी तब तक ताली नहीं बजेगी और दोनों सहेली नहीं बन पाएगी।

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इसके कुछ कारण जो मैं समझती हूं वो है –

1. इसका पहला कारण है कि दोनों एक दूसरे को समझ नहीं पाती। मां अपने बच्चे को शुरु से ही देखती आ रही है इसलिए वह उसकी अच्छाई व बुराई सब समझ पाती है। सास बहु का रिश्ता एक दम नया होता है, इसलिये समय तो देना चाहिए।

2. दो घरों की विविधता इस रिश्ते में कठिनाई का कारण बनती हैं, चाहे वह समान धर्म के लोग हों या अलग धर्म के। पौधे का हवा पानी बदलता है तो वो मुरझा जाता है। एक नव विवाहिता भी उसी पौधे के समान होती है।

3. उम्र का फर्क भी बहुत मायने रखता है। बड़े लोग आसानी से अपने आप को बदल नहीं पाते और उनमें एक आधिपत्य की भावना होती है, फिर वह मां ही क्यों न हो। ऐसे में बहु की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बहु को थोड़ा समझना चाहिए।

4. अहम को छोड़ देना चाहिए। जब तक “मैं” रहेगी, चाहे वह सास मे हो या बहु मे, रिश्ता कभी नहीं बन पाएगा। एक ने कही दूसरे ने मानी, इसी का नाम बुद्धिमानी। किन्तु कोई ज़रूरी नहीं कि हर बार न चाहते हुए भी हां करें। चार बार कहना मानें तो एक बार नहीं भी मानेंगे तो चलेगा।

5. बच्चों से सीखना चाहिए। अभी झगड़ा हुआ और अभी मेल मिलाप हो गया। कभी किसी बात पर वाद विवाद हो भी जाए तो उसको भूलना ही बेहतर है। यदी उस झगड़े को लेकर आगे बढेंगे तो कभी दोस्त नहीं बन पाएंगे।

6. किसी भी रिश्ते में मर्यादा का ध्यान रखना ज़रूरी होता है। हर व्यक्ति का अपना द्रष्टिकोण होता है। उसके द्रष्टिकोण को भी उतनी ही एहमियत देनी चाहिए जितनी स्वयं को। झुकने मे कोई व्यक्ति छोटा नहीं हो जाता।

7. अपनी गलतियों को भी देखना व पहचानना चाहिए और सुधारना चाहिए और जितनी जल्दी हो सके माफी मांगना चाहिए।

8. किसी भी रिश्ते मे 100 प्रतिशत तो नहीं मिलते। इसलिए यदि जो हमारी ओर से 50% है, यदि हम वो सारा दे दें तो दूसरी ओर से 25% तो मिल ही जाएगा। 75% अच्छा होने से वह रिश्ता अच्छा ही होता है।

9. सास , बहु और वो। यह वो हर जगह परेशान करता है। पति, पत्नी और वो के रिश्ते की तरह इस रिश्ते में भी कोई तीसरा आए, चाहे वो कोई भी हो तो मन मुटाव बढ़ जाता है। किसी दूसरे की बात पर ध्यान न देकर आपसी मत भेद को आपस मे ही मिटाए तो अच्छा रहता है। फोन पर कभी सास अपनी बेटी से या बहु नी मां से अगर एक दूसरे की बुराई करें तो वह भी दरार का कारण बनती है। यहां तक कि पति और ससुर को भी इस रिश्ते से दूर रखना चाहिए।

10. बहु की बेटी से या दूसरे कि बहुओं से और सास की मां से या फिर दूसरे की सास से तुलना न करें। आशाएं न रखें। किसी ने कुछ कर दिया तो भी अच्छा और अगर न किया तो भी अच्छा। उनकी क्षमता को देखते हुए व्यवहार करना चाहिए। क्षमता से बाहर तो मां भी अपनी बेटी को मना कर देती है। यदि मां डांटें तो कोई बात नहीं और यदि सास ने कुछ कहा तो मुहल्ले मे ढिंढोरा पीट दिया, ऐसा भी नहीं होना चाहिए।

जानती हूँ कि कहना आसान होता है पर करना मुश्किल, फिर भी कोशिश तो करी जा सकती है आखिर घर भी हमारा है और रिश्ते भी। और वैसे भी, तोड़ने से बेहतर तो जोड़ना ही है।

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Motherhood – Where Every Phase Brings in a New Challenge #MondayMommyMoments

 

Motherhood is indeed a very challenging phase. It is a phase that changes a woman completely. So much so, that I cannot even recognise myself now. But there is one thing which I know about myself now and that is I am a mother. Before that I had many words in my dictionary to describe myself but now one word sums me up completely i.e. A Mother.

When my elder one was born, I used to think that perhaps handling a new born is the most difficult phase. Soon, she turned two and I felt “Oh My God! This is terrible.” Her tantrums were beyond control. I assured myself then that perhaps this is the most difficult phase. It will be better once she grows up a little.

Then, started her schooling. Every morning, half an hour used to be the crying time; “I don’t want to go to school!”

Again, I consoled myself, “This too shall pass”.

Ultimately, we sailed through. Now, again years have gone by, I am a mother of two now.  But Motherhood challenges seems to be unending.

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The New Born:

Be it a new born baby or should I call “the new born mom”, this is the challenge where both simply do not know each other. How to do? What to do? At times, even “why am I here?” “why do I have to be surrounded in poops and vomits all the times?” “Can someone handle the baby while I can go peacefully to the loo?”

With a new born in hand, I often found myself clueless. “Is the baby alright while sleeping?” “Did I miss the sound of the burp?”

It’s okay moms. You are doing just fine and the baby is fine too. No need to stress yourself too much there.

Toddler Tantrums

Not only the terrible twos but my kids have been throwing tantrums much after that. I don’t know when they will stop doing so. They copy each other and follow each other’s footsteps just to get our attention. For handling a toddler, one needs to be a pro in diverting the kid’s attention.

The Fussy Eater

Another big challenge for a mom is too deal with the fussy eating habits of her child. Whatever is served to them will rarely go down their tummies. I remember how I ended up over eating myself with the leftover food of my kids and resulted in few extra kilos of weight on myself.

Then spotting a pigeon in the balcony came to my rescue. I would love to thank all the pigeons and crows that perched my balcony when my toddler would throw a tantrum while eating. Spotting a pigeon always helped me in diverting her attention and make her eat a bite or two.

The Pre-Schooler and the Senior School Going

Now, when one of my girls is going to Grade 4 and another one is in kindergarten, managing their studies at the same time becomes a challenge. At the time when I was not a mother, I could easily handle 40 students in my classroom. Now, teaching two at home has become terrible.

You keep any number of stationery and still the eraser is forever missing. All the sharpened pencils suddenly lose their tips.

Patience, Patience and some more Patience

In between all these challenges, one thing which goes amiss is your patience. The biggest challenge then becomes is to take hold of your sanity and patience. Once you get hold of it, other things start falling in place.

So, all the mommies out there, what are your challenges in this beautiful journey of motherhood? Do share with me.

A fellow blogger shares her wonderful thoughts on the same topic. 

Enjoy reading her thoughts Amrita andDeepa .

This post has been written for #MondayMommyMoments. 

(Follow on Twitter @DeepaGandhi1 and @misra_amrita )