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​कुछ पाने की चाह मे

मैं भागती रही , दौड़ती रही,
कुछ पाने की चाह मे,

यह कर लूं, वह पा लूं, 

थमी नहीं रुकी नहीं,

लेकिन 

जीवन की शाम मे 

थोड़ा रुकी, थोड़ा थमी,

एक पल , एक क्षण के लिए,

क्या सोचा, क्या पाया, क्या खोया,

जो जैसा था , वो वैसा ही रहा।

मैं भाग रही थी, 

यूं ही कुछ पाने की चाह मे!

अब न कोई चाह है,

न कोई नई राह है।

शायद वह जीवन की कोई 

मृगतृष्णा थी।

जिसकी तलाश मे मैं,

भागती रही , दौड़ती रही,

कुछ पाने की चाह मे, 

जो पाया वो चाहा नहीं,

जो चाहा वो पाया नहीं, 

मैं दौड़ती रही,

कुछ पाने की चाह मे,

अब न तमन्ना हैं,

न ताकत है

फिर क्यों मैं भागी, 

कुछ पाने की चाह मे,

शायद यही जीवन का तथ्य है,

भागते रहो कुछ पाने की चाह मे।

15 thoughts on “​कुछ पाने की चाह मे”

  1. बेहतरीन लेखन–बहुत खूब।।
    अजीब दास्तान है दुनियाँ की,
    हम चाहते हैं वो अक्सर मिलता नहीं,
    जो मिलता है उसे हम चाहते नहीं,
    मृगतृष्णा सी जिंदगी,
    बेचैन रहती है।।

  2. आपकी कविता अति अभिलाषी और सुंदर है।

    उसी की राह में मेरा ये कथन….

    चाह रही बचपन की, के जम के उत्पात मचाऊँ,
    किशोर हुआ तो ज्ञान मिला, कुछ ज्ञात अभी तक नही हुआ,
    तरुण बिता ऐसा की जैसे हाथ में पानी मुट्ठीभर,
    प्रौढ़ अवस्था बीत गयी परिवार के पालन पोषण पर।
    अंत समय ऐसा आया अब क्या कुछ बात बताऊँ
    फिर..
    फिर सोच पड़ा, बच्चा बनकर जमकर उत्पात मचाऊं।

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