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वर वधु की तलाश – विज्ञापनों के साथ बदलता समाज(एक हास्य लेख)

पहले ज़माने मे जब भी किसी मां बाप को अपनी लड़की के लिए वर की तलाश होती थी तो वे रिश्तेदारों को बोलते थे या अखबार में मैट्रीमोनीयल पर विज्ञापन देते थे। हर सप्ताह अखबार के मैट्रीमोनीयल कालम मे खोज कर चार पाँच विज्ञापनों पर गोला लगाते थे और फिर उनके बारे मे जाँच पड़ताल करते थे।

तब वर के लिए नियम बहुत कम होते थे। 23 साल की कन्या के लिए वर ढूंढना हो तो 27-28 साल , सम्भ्रांत परिवार का डाक्टर या इंजीनियर ।

एक कालम होता था मांगलिक या नान मांगलिक जन्म कुंडली के अनुसार। पंजाबी के लिए पंजाबी, अग्रवाल के लिए अग्रवाल। धीरे धीरे समय बदलता गया और वर के लिए योग्यताओं मे एक और नियम जुड़ गया – caste no bar यानि कि इंटर कास्ट विवाह। और इस तरह इंटर कास्ट विवाह को समाज द्वारा मान्यता मिली। 

कई विज्ञापनों मे tee-totaller की योग्यता भी मांगी गई। अजी Tee-totaller लड़के क्या, आजकल तो tee-totaller लड़कियां भी नहीं मिलती। 

समय बदला और समाज ने थोड़ी और उन्नति की। पहले लव मैरिज को उचित नहीं समझते थे यह सोच कर कि लोग क्या कहेंगे किन्तु अब माता पिता के लिए आसान हो गया। लड़की को उच्च शिक्षा दी , अच्छे पद पर नौकरी के काबिल बनाया और निश्चिंत हो गए कि अब लड़की अपने लिए पसंद का वर ढूंढ ही लेगी। 

पर यह क्या , एक और नई समस्या आने लगी कि जी लड़की की आय लड़के से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए नहीं तो स्वाभिमान की लड़ाई शुरू हो जाएगी। लो कर लो बात अब वर वधु के बीच आई लड़की की आय व स्वाभिमान की दीवार। 


कई बार पढाई के दौरान आपसी मित्रता विवाह के बंधन तक पहुंच गई। लड़की के ब्याह की चिंता जो उसके पैदा होने पर ही सताने लगती थी, “पराया धन” समझ कर , वह चिन्ता अब समाप्त हुई। 

इस तरह कुछ चिन्ताओ से मुक्ति मिली- 

दहेज की चिन्ता नहीं , 

वर या वधु ढूंढने की चिन्ता नहीं,

लड़की को ससुराल मे आने वाली समस्या की भी चिन्ता नहीं।

समाज कितना बदल गया है। अब लड़की या लड़के के लिए जीवन साथी ढूंढना हुआ और आसान। जो पहले अखबारों तक या marriage bureau तक व मन्दिरों के पंडितों तक सीमित था अब वो social media पर छा गया।

पहले के इश्तहार आज भी याद आते हैं- 

“वर ही वर – संपर्क करें शर्मा जी से”

“रिश्ते ही रिश्ते – 28 रैगड़ पुरा” 

और अब देखिए – 

कृपया log in करें – ‘www….com’ पर।

चलिए अब कम से कम ‘रिश्ते’ ढूंढने के लिए कहीं जाने या किसी से मिलने की ज़रूरत नहीं।

मुझे याद है कुछ साल पहले पड़ोसिन ने अपनी लड़की के लिए तलाक शुदा वर ढूंढा तो सबने उसे फटकार लगाई कि तुम्हें अपनी बेटी के लिए और कोई वर नहीं मिला जो एक तलाक शुदा से अपनी बेटी की शादी करना चाहते हो? मगर आज की मैट्रीमोनियल विज्ञापन तो देखिए – 

Caste no bar

Age no bar
Marital status no bar

Kids no bar !!!

भई वाह! अब तो सबके सब ‘bar’ ही हटा दिए। मेरी सहेली ने आकर बताया कि उसकी मित्र का पति उससे दो साल छोटा है तो सब आपस मे फुसफुसाने लगे , “देखो, क्या ज़माना आ गया है। हमारे ज़माने मे तो वर की उम्र वधु से कम से कम दस साल ज्यादा होती थी वहीं अब वधू की उम्र वर से ज्यादा होने लगी। सही कहा – “age no bar” ।

Edit

अजी ज़माना तो आपके भले के लिए ही बदला है। न दहेज की चिन्ता, न रिश्तेदारों का डर । लड़की हुई तो उसके ब्याह की भी चिन्ता नहीं, लड़की शादी करे या न करें यह भी चिन्ता नहीं, अगर ज़रूरी है तो उसकी शिक्षा , उसका स्वावलंबी होना, उसका आत्मविश्वास, शादी किसी से हो या न हो कोई फर्क नहीं पड़ता।

हाँ बस अब एक ही प्रश्नचिन्ह रह गया है। पुरुष दो बच्चों के बाद भी विधुर  हो तो चाहता है कि उसे लड़की मिले जिसके बच्चे नहीं हो और वह उसके बच्चों को अपने बच्चों की तरह पाले परन्तु स्त्री के साथ ऐसा नहीं है। 

किन्तु यह अभी दूर की सोच है। फिर सोचती हूँ कि बाकी सब bar की तरह शायद यह bar भी जल्दी हट जाए और कहा जाए ‘शादी बार बार’। 

Author:

A stay at home mother and a teacher by qualification, I have worked as a makeup artist for several years. Writing is my current passion which helps me in adding wings to my creativity.

7 thoughts on “वर वधु की तलाश – विज्ञापनों के साथ बदलता समाज(एक हास्य लेख)

  1. hahaha a very fun read. I fall in the age no bar criteria too. haha and frankly most of these bars have no significance these days.. as Shahrukh Khan’s movies say “Someone somewhere is made for you.” 🙂

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  2. What a wonderful way of highlighting the reality! Loved the comparisons you have drawn.. times truly have changed, some for good and some for not-so-good may be!

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  3. My father works in a newspaper daily and for a long time he was engaged in the department that works on the classified section of the newspaper. Everything you have mentioned was discussed at my home around 10 years back. And the cultural changes are also very apt.

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