Life style, Poetry, Uncategorized, हिन्दी

समंदर का लहरों से रिश्ता

समंदर ने कहा लहरों से, “कुछ देर तो थम जा बाहों में,
यूँ मचलती है क्यूँ , यूँ उछलती है क्यूँ,
क्या रखा हैं उन किनारों में.”
लहरें ना थमी , ना रुकी, ना ठहरी,
कहने लगी, “किनारा है मेरी मंजिल, ना तू मेरी राहों में,
किनारा करता है मेरा इंतज़ार , जाना है ज़रूरी , ना तू मेरे पास,

pexels-photo-748626.jpeg
समंदर था गहरा, हुआ अशांत और अकेला,
देख चंदा की शीतलता , आखिर पूछ ही बैठा ,
कैसे रोकूं इन चंचल लहरों को, कैसेे थामूं इन्हें अपनी बाहों मे ,”
चाँद मुस्कुराया और बोला, “तू परेशान है क्यूँ , तू उदास है क्यूँ,
तू तो समंदर है , लहरों का घर है,
किनारा तो एक आकर्षण है, एक भ्रम है,
उसकी धरती पर तो मिट्टी है, जो उङ जाती है हवाओं से,”

pexels-photo-127673.jpeg
समंदर हुआ शांत, धरधीर बहा के नीर,
चुपचाप देखता रहा लहरों को ,
लहरें आती जाती रहती ,
समंदर सिसकियाँ भरता रहता ,
कुछ तरसती आखों से , कुछ सुबकती साँसों से ,
दिल में दर्द को दबाये रहता ,
रात को चाँद फिर आया , अपनी शीतलता फिर लाया ,
समंदर फिर संभला , फिर कुछ ठहरा ,
उसकी उदासी बस चाँद ही समझता.

pexels-photo-414320.jpeg

Blogs, Life style, Social Responsibilty, Uncategorized, हिन्दी

वर वधु की तलाश – विज्ञापनों के साथ बदलता समाज(एक हास्य लेख)

पहले ज़माने मे जब भी किसी मां बाप को अपनी लड़की के लिए वर की तलाश होती थी तो वे रिश्तेदारों को बोलते थे या अखबार में मैट्रीमोनीयल पर विज्ञापन देते थे। हर सप्ताह अखबार के मैट्रीमोनीयल कॉलम  मे खोज कर चार पाँच विज्ञापनों पर गोला लगाते थे और फिर उनके बारे मे जाँच पड़ताल करते थे।

तब वर के लिए नियम बहुत कम होते थे। 23 साल की कन्या के लिए वर ढूंढना हो तो 27-28 साल , सम्भ्रांत परिवार का डॉक्टर  या इंजीनियर ।

मत्रिमोनिअल १

(pic courtesy : pinterest)

एक कॉलम होता था मांगलिक या नान मांगलिक जन्म कुंडली के अनुसार। पंजाबी के लिए पंजाबी, अग्रवाल के लिए अग्रवाल। धीरे धीरे समय बदलता गया और वर के लिए योग्यताओं मे एक और नियम जुड़ गया – caste no bar यानि कि इंटर कास्ट विवाह। और इस तरह इंटर कास्ट विवाह को समाज द्वारा मान्यता मिली। 

कई विज्ञापनों मे tee-totaller की योग्यता भी मांगी गई। अजी Tee-totaller लड़के क्या, आजकल तो tee-totaller लड़कियां भी नहीं मिलती। 

समय बदला और समाज ने थोड़ी और उन्नति की। पहले लव मैरिज को उचित नहीं समझते थे यह सोच कर कि लोग क्या कहेंगे किन्तु अब माता पिता के लिए आसान हो गया। लड़की को उच्च शिक्षा दी , अच्छे पद पर नौकरी के काबिल बनाया और निश्चिंत हो गए कि अब लड़की अपने लिए पसंद का वर ढूंढ ही लेगी। 

पर यह क्या , एक और नई समस्या आने लगी कि जी लड़की की आय लड़के से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए नहीं तो स्वाभिमान की लड़ाई शुरू हो जाएगी। लो कर लो बात अब वर वधु के बीच आई लड़की की आय व स्वाभिमान की दीवार। 


कई बार पढाई के दौरान आपसी मित्रता विवाह के बंधन तक पहुंच गई। लड़की के ब्याह की चिंता जो उसके पैदा होने पर ही सताने लगती थी, “पराया धन” समझ कर , वह चिन्ता अब समाप्त हुई। 

इस तरह कुछ चिन्ताओ से मुक्ति मिली- 

दहेज की चिन्ता नहीं ,

वर या वधु ढूंढने की चिन्ता नहीं,

लड़की को ससुराल मे आने वाली समस्या की भी चिन्ता नहीं।

समाज कितना बदल गया है। अब लड़की या लड़के के लिए जीवन साथी ढूंढना हुआ और आसान। जो पहले अखबारों तक या marriage bureau तक व मन्दिरों के पंडितों तक सीमित था अब वो social media पर छा गया।

matrimonial

(pic courtesy : adbazzaar )

 

पहले के इश्तहार आज भी याद आते हैं- 

“वर ही वर – संपर्क करें शर्मा जी से”

“रिश्ते ही रिश्ते – 28 रैगड़ पुरा” 

और अब देखिए – 

कृपया log in करें – ‘www….com’ पर।

चलिए अब कम से कम ‘रिश्ते’ ढूंढने के लिए कहीं जाने या किसी से मिलने की ज़रूरत नहीं।

मुझे याद है कुछ साल पहले पड़ोसिन ने अपनी लड़की के लिए तलाक शुदा वर ढूंढा तो सबने उसे फटकार लगाई कि तुम्हें अपनी बेटी के लिए और कोई वर नहीं मिला जो एक तलाक शुदा से अपनी बेटी की शादी करना चाहते हो? मगर आज की मैट्रीमोनियल विज्ञापन तो देखिए – 

Caste no bar

Age no bar
Marital status no bar

Kids no bar !!!

भई वाह! अब तो सबके सब ‘bar’ ही हटा दिए। मेरी सहेली ने आकर बताया कि उसकी मित्र का पति उससे दो साल छोटा है तो सब आपस मे फुसफुसाने लगे , “देखो, क्या ज़माना आ गया है। हमारे ज़माने मे तो वर की उम्र वधु से कम से कम दस साल ज्यादा होती थी वहीं अब वधू की उम्र वर से ज्यादा होने लगी। सही कहा – “age no bar” ।

Edit

अजी ज़माना तो आपके भले के लिए ही बदला है। न दहेज की चिन्ता, न रिश्तेदारों का डर । लड़की हुई तो उसके ब्याह की भी चिन्ता नहीं, लड़की शादी करे या न करें यह भी चिन्ता नहीं, अगर ज़रूरी है तो उसकी शिक्षा , उसका स्वावलंबी होना, उसका आत्मविश्वास, शादी किसी से हो या न हो कोई फर्क नहीं पड़ता।

हाँ बस अब एक ही प्रश्नचिन्ह रह गया है। पुरुष दो बच्चों के बाद भी विधुर  हो तो चाहता है कि उसे लड़की मिले जिसके बच्चे नहीं हो और वह उसके बच्चों को अपने बच्चों की तरह पाले परन्तु स्त्री के साथ ऐसा नहीं है। 

किन्तु यह अभी दूर की सोच है। फिर सोचती हूँ कि बाकी सब bar की तरह शायद यह bar भी जल्दी हट जाए और कहा जाए ‘शादी बार बार’।

Blogs, Life style, Poetry, Uncategorized, हिन्दी

​कुछ पाने की चाह मे

मैं भागती रही , दौड़ती रही,
कुछ पाने की चाह मे,

यह कर लूं, वह पा लूं, 

थमी नहीं रुकी नहीं,

लेकिन 

जीवन की शाम मे 

थोड़ा रुकी, थोड़ा थमी,

एक पल , एक क्षण के लिए,

क्या सोचा, क्या पाया, क्या खोया,

जो जैसा था , वो वैसा ही रहा।

मैं भाग रही थी, 

यूं ही कुछ पाने की चाह मे!

अब न कोई चाह है,

न कोई नई राह है।

शायद वह जीवन की कोई 

मृगतृष्णा थी।

जिसकी तलाश मे मैं,

भागती रही , दौड़ती रही,

कुछ पाने की चाह मे, 

जो पाया वो चाहा नहीं,

जो चाहा वो पाया नहीं, 

मैं दौड़ती रही,

कुछ पाने की चाह मे,

अब न तमन्ना हैं,

न ताकत है

फिर क्यों मैं भागी, 

कुछ पाने की चाह मे,

शायद यही जीवन का तथ्य है,

भागते रहो कुछ पाने की चाह मे।

Blogs, Life style, Uncategorized, हिन्दी

मेरे विघ्नहरता और मैं 

इस वर्ष 25 अगस्त को गणेश चतुर्थी का आरम्भ होगा और 5 सितम्बर को समापन होगा।

आजकल गणेश चतुर्थी का महत्व बढता जा रहा है और अब इस त्यौहार को देश के हर कोने मे मनाया जाता है। गणपति भगवान विघ्नहरता माने जाते हैं। लोग गणेश भगवान की मूर्ति को घरों व मन्दिरो मे भी स्थापित करते हैं और फिर कोई पांच दिन व कोई दस दिन बाद धूमधाम से इसका विसर्जन करते हैं।

पिछले कुछ वर्षों से मेरी भी आस्था इस त्यौहार मे बढती जा रही है। जैसे ही पास के मंदिर मे गणपति जी को स्थापित करने का जुलूस धूमधाम से निकलता है तो मानो मेरे कदम खुद ब खुद उनकी तरफ खिचे चले जाते हैं। पूरे हर्ष उल्लास के साथ उसमें शामिल होती हूँ। सच मे जो भक्त भगवान की स्थापना मे व्यस्त होते हैं उनकी श्रद्धा और सहयोग देखकर मन भाव विभोर हो जाता है।गणपति भगवान की वो बढी सी आलीशान मूर्ति को जिस प्यार और श्रद्धा के साथ स्थापित करते हैं तो यूं लगता है की मानो वो स्वयं ही आ के सामने बैठे हों।

जिस एहतियात के साथ उन्हें बिठाया जाता है तो लगता है कि वे आहत न हो जाएं। ढोल, नगाड़े, नृत्य व संगीत के साथ जब जुलूस आता है और मंदिर पहुंचता है तो मन उद्वेलित हो जाता है। फिर सभी रीति रिवाजों के साथ उनकी पूजा अर्चना करना, प्रेम भाव से मिलजुल मंदिर मे एक साथ भोजन करना और पांच दिन तक एक त्योहार का सा माहौल रहता है। शाम के समय की आरती, दिन मे किसी ने अलग से पूजा , हवन या यग्य करवाना हो, ये सब देखकर लगता है कि त्योहारों का मौसम आ गया। वैसे तो त्योहारों का मौसम रक्षाबंधन से शुरु हो जाता है किन्तु गणेश चतुर्थी की बढती रौनक का अपना ही आनंद है। जिस तरह से सब लोग शाम की आरती के बाद एक साथ खाना खाते हैं, तो लगता है की गणेश जी ने अपनी भक्ति व प्रेम के एक सूत्र मे सबको बांध दिया हो।

पांच दिन तक मंदिर मे कपूर व चन्दन की महक मन को मोहित करती है। रोज़ पुष्पों से सुशोभित गणपति भगवान के दर्शन करने जाती हूँ तो वापस आने का मन ही नहीं करता। ऐसा लगता है की सामने बैठे विघ्नहरता मेरे मन की सारी बातें सुन रहे हों। बस ऐसा लगता है की यूहीं बैठे उनसे बातें करती रहूं। मन मे उठते भावनाओं के समंदर को बस वे ही सुन व समझ सकते हैं। उस समय उनके सामने बैठे एक अजीब सी आत्मिक शांति मिलती है। गणपति चतुर्थी का हर साल खास इंतजा़र रहता है।

पांच दिनों के बाद जब विसर्जन का समय आता है तो मन भावुक सा हो जाता है। किन्तु जब सब एक साथ एक स्वर मे गाते हैं, “गणपति बाप्पा मोरेया, अगले बरस तु जल्दी आ”, तो मन मे एक नई आशा जागती है और खुद को सांतवना देती हूँ की अगले वर्ष प्रभु फिर आएंगे विघ्न हरने के लिए।

आप सभी को भी मेरी ओर से गणेश चतुर्थी की बहुत बहुत शुभकामनाएं।

This post was published on mycity4kids : https://www.mycity4kids.com/parenting/my-kids-my-wings/article/mere-vighnaharata-aura-mai-n

cover image: desicomments.com

Blogs, parenting, Senior Citizens, Uncategorized, हिन्दी

मेरी नानी की कहानी, मेरी मां की जु़बानी

यह कहानी मेरी नहीं, मेरी मां की है। आज की

इस कहानी में जज़्बात भी उनके हैं, और अल्फाज़ भी उनके।

इसलिए इस कहानी में मैंने कोई बदलाव नहीं किए। उम्मीद करती हूँ, आपको पसंद आएगी :

मेरी शादी हुई तो मुझे मां बाप से बिछड़ने का बहुत दुख था पर सुकून था कि मैं उसी शहर में हूँ तो आती जाती रहूंगी। मेरे पिताजी की सेहत ठीक नहीं रहती थी। हालांकि वो नौकरी भी करते थे। अच्छी पोस्ट पर भी थे, मेरी शादी के बाद मुझसे मिलने भी आते थे, मेरा कोई काम होता तो अवश्य करते।

कभी कभी जब मैं अकेले होती तो यह सोच कर घबरा जाती थी कि मेरे पिताजी की तबियत ठीक नहीं रहती। उनके बहुत करीब थी। उनकी याद आखोँ में आँसु ले आती। कुछ साल बाद, उनकी

तबियत और बिगड़ने लगी। अब मैं बैठे बैठे डर जाती कि अगर मेरे पिताजी को कुछ हो गया तो? मुझे लगता था कि मेरी दुनिया वहीं रुक जाएगी। और फिर दिन ….वही हुआ…

मेरे पिताजी दफ्तर गए और वहां उनकी तबीयत खराब हुई। उन्हें जल्द अस्पताल ले जाना पड़ा। शाम को अस्पताल से खबर मिली कि पिताजी मां को याद कर रहे हैं। मां उनसे मिलने अस्पताल गई। जब घर लौटी तो बोली, “मैं खाली हाथ आ गई”। मुझे समझ नहीं आया। तब पता चला कि मां को देखते ही पिताजी ने आखिरी सांस ली और चल बसे।

अब तक तो कुछ समझ नहीं आया। ऐसा झटका लगा कि बुद्धि ने काम करना बन्द कर दिया, किन्तु पिताजी की तेरहवीं पर जब मैंने मां को सीड़ियों से उतरते देखा तो एक मिनट के लिए सांस ही रुक गई। मैंने अपनी मां को सफेद साड़ी में बिल्कुल सादे और शांत रूप में देखा। मुझे जीवन का सबसे बड़ा झटका लगा जब मैने अपनी मां को इस रुप मे देखा। तब असली एहसास हुआ कि पिताजी नहीं रहे। मैं रो रो कर बेहाल थी। बस चिल्लाई जा रही थी, “यह ठीक नहीं हुआ, यह ठीक नहीं हुआ”

उस वक्त मां ने ही मुझे सम्भाला, बोली “यही जीवन की सच्चाई है इसे जितनी जल्दी समझ लेंगे उतना ही हम लोगों के लिए अच्छा है”।

मैं अपनी मां का वो शांत रुप देख कर बिल्कुल स्तब्ध थी किन्तु मुझे शक्ति भी मिली। जीवन की सबसे कड़वी सच्चाई का मां ने इतने सहज रुप से स्वीकार किया। मुझे अपनी मां पर गर्व भी हो रहा था। मेरी मां स्कूल में अध्यापिका थी और हम पांच बहने। पिताजी की मृत्यु के समय दो की शादी हुई थी और बाकियो की होनी थी। एक छोटी बहन तो बहुत ही छोटी थी। शायद उनको देखकर मां ने संयम रखा होगा। मां ने हिम्मत के साथ मेरी दोनों छोटी बहनों को पढा लिखा कर उनका ब्याह किया। मुझे आज भी याद है, सबसे छोटी बहन के ब्याह के बाद मेरी मां पहली बार रोई थी कि सब मुझे छोड़ कर चले गए। उनका मतलब पिताजी से था। तब मुझे लगा कि मां ने कितने सालों तक वह दर्द अपने अन्दर छुपा कर रखा था ताकि उसकी बेटियाँ कमजो़र ना बनें।

आज भी मां की वो सीख याद है, “जीवन की कड़वी सच्चाईयों का सामना हिम्मत से करना चाहिए। जि़दगी तो चलती ही रहेगी। हिम्मत रखेंगे तो बड़ी से बड़ी जि़म्मेदारी भी निभा पाएंगे”। मुझे एक बात का एहसास भी हुआ कि मंजिल पर पहुंच कर ही थकान का एहसास होता है, और कहीं ना कहीं यह खुशी भी होती है कि हमने अपनी जि़म्मेदारियां अच्छे से निभाई।

यही है मां की सीख- तकलीफ मे घबराना नहीं चाहिए, हिम्मत से काम लेना चाहिए। सब समस्याएं समय के साथ हल हो जाती हैं।  

 

This post was published on mycity4kids : https://www.mycity4kids.com/parenting/my-kids-my-wings/article/meri-nani-ki-kahani-meri-ma-n-ki-jubani