Posted in हिन्दी, Blogs, Life style, Social Responsibilty, Uncategorized

वर वधु की तलाश – विज्ञापनों के साथ बदलता समाज(एक हास्य लेख)

पहले ज़माने मे जब भी किसी मां बाप को अपनी लड़की के लिए वर की तलाश होती थी तो वे रिश्तेदारों को बोलते थे या अखबार में मैट्रीमोनीयल पर विज्ञापन देते थे। हर सप्ताह अखबार के मैट्रीमोनीयल कालम मे खोज कर चार पाँच विज्ञापनों पर गोला लगाते थे और फिर उनके बारे मे जाँच पड़ताल करते थे।

तब वर के लिए नियम बहुत कम होते थे। 23 साल की कन्या के लिए वर ढूंढना हो तो 27-28 साल , सम्भ्रांत परिवार का डाक्टर या इंजीनियर ।

एक कालम होता था मांगलिक या नान मांगलिक जन्म कुंडली के अनुसार। पंजाबी के लिए पंजाबी, अग्रवाल के लिए अग्रवाल। धीरे धीरे समय बदलता गया और वर के लिए योग्यताओं मे एक और नियम जुड़ गया – caste no bar यानि कि इंटर कास्ट विवाह। और इस तरह इंटर कास्ट विवाह को समाज द्वारा मान्यता मिली। 

कई विज्ञापनों मे tee-totaller की योग्यता भी मांगी गई। अजी Tee-totaller लड़के क्या, आजकल तो tee-totaller लड़कियां भी नहीं मिलती। 

समय बदला और समाज ने थोड़ी और उन्नति की। पहले लव मैरिज को उचित नहीं समझते थे यह सोच कर कि लोग क्या कहेंगे किन्तु अब माता पिता के लिए आसान हो गया। लड़की को उच्च शिक्षा दी , अच्छे पद पर नौकरी के काबिल बनाया और निश्चिंत हो गए कि अब लड़की अपने लिए पसंद का वर ढूंढ ही लेगी। 

पर यह क्या , एक और नई समस्या आने लगी कि जी लड़की की आय लड़के से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए नहीं तो स्वाभिमान की लड़ाई शुरू हो जाएगी। लो कर लो बात अब वर वधु के बीच आई लड़की की आय व स्वाभिमान की दीवार। 


कई बार पढाई के दौरान आपसी मित्रता विवाह के बंधन तक पहुंच गई। लड़की के ब्याह की चिंता जो उसके पैदा होने पर ही सताने लगती थी, “पराया धन” समझ कर , वह चिन्ता अब समाप्त हुई। 

इस तरह कुछ चिन्ताओ से मुक्ति मिली- 

दहेज की चिन्ता नहीं , 

वर या वधु ढूंढने की चिन्ता नहीं,

लड़की को ससुराल मे आने वाली समस्या की भी चिन्ता नहीं।

समाज कितना बदल गया है। अब लड़की या लड़के के लिए जीवन साथी ढूंढना हुआ और आसान। जो पहले अखबारों तक या marriage bureau तक व मन्दिरों के पंडितों तक सीमित था अब वो social media पर छा गया।

पहले के इश्तहार आज भी याद आते हैं- 

“वर ही वर – संपर्क करें शर्मा जी से”

“रिश्ते ही रिश्ते – 28 रैगड़ पुरा” 

और अब देखिए – 

कृपया log in करें – ‘www….com’ पर।

चलिए अब कम से कम ‘रिश्ते’ ढूंढने के लिए कहीं जाने या किसी से मिलने की ज़रूरत नहीं।

मुझे याद है कुछ साल पहले पड़ोसिन ने अपनी लड़की के लिए तलाक शुदा वर ढूंढा तो सबने उसे फटकार लगाई कि तुम्हें अपनी बेटी के लिए और कोई वर नहीं मिला जो एक तलाक शुदा से अपनी बेटी की शादी करना चाहते हो? मगर आज की मैट्रीमोनियल विज्ञापन तो देखिए – 

Caste no bar

Age no bar
Marital status no bar

Kids no bar !!!

भई वाह! अब तो सबके सब ‘bar’ ही हटा दिए। मेरी सहेली ने आकर बताया कि उसकी मित्र का पति उससे दो साल छोटा है तो सब आपस मे फुसफुसाने लगे , “देखो, क्या ज़माना आ गया है। हमारे ज़माने मे तो वर की उम्र वधु से कम से कम दस साल ज्यादा होती थी वहीं अब वधू की उम्र वर से ज्यादा होने लगी। सही कहा – “age no bar” ।

Edit

अजी ज़माना तो आपके भले के लिए ही बदला है। न दहेज की चिन्ता, न रिश्तेदारों का डर । लड़की हुई तो उसके ब्याह की भी चिन्ता नहीं, लड़की शादी करे या न करें यह भी चिन्ता नहीं, अगर ज़रूरी है तो उसकी शिक्षा , उसका स्वावलंबी होना, उसका आत्मविश्वास, शादी किसी से हो या न हो कोई फर्क नहीं पड़ता।

हाँ बस अब एक ही प्रश्नचिन्ह रह गया है। पुरुष दो बच्चों के बाद भी विधुर  हो तो चाहता है कि उसे लड़की मिले जिसके बच्चे नहीं हो और वह उसके बच्चों को अपने बच्चों की तरह पाले परन्तु स्त्री के साथ ऐसा नहीं है। 

किन्तु यह अभी दूर की सोच है। फिर सोचती हूँ कि बाकी सब bar की तरह शायद यह bar भी जल्दी हट जाए और कहा जाए ‘शादी बार बार’। 

Posted in हिन्दी, Blogs, Life style, Poetry, Uncategorized

​कुछ पाने की चाह मे

मैं भागती रही , दौड़ती रही,
कुछ पाने की चाह मे,

यह कर लूं, वह पा लूं, 

थमी नहीं रुकी नहीं,

लेकिन 

जीवन की शाम मे 

थोड़ा रुकी, थोड़ा थमी,

एक पल , एक क्षण के लिए,

क्या सोचा, क्या पाया, क्या खोया,

जो जैसा था , वो वैसा ही रहा।

मैं भाग रही थी, 

यूं ही कुछ पाने की चाह मे!

अब न कोई चाह है,

न कोई नई राह है।

शायद वह जीवन की कोई 

मृगतृष्णा थी।

जिसकी तलाश मे मैं,

भागती रही , दौड़ती रही,

कुछ पाने की चाह मे, 

जो पाया वो चाहा नहीं,

जो चाहा वो पाया नहीं, 

मैं दौड़ती रही,

कुछ पाने की चाह मे,

अब न तमन्ना हैं,

न ताकत है

फिर क्यों मैं भागी, 

कुछ पाने की चाह मे,

शायद यही जीवन का तथ्य है,

भागते रहो कुछ पाने की चाह मे।

Posted in हिन्दी, Blogs, Life style, Uncategorized

मेरे विघ्नहरता और मैं 

इस वर्ष 25 अगस्त को गणेश चतुर्थी का आरम्भ होगा और 5 सितम्बर को समापन होगा।

आजकल गणेश चतुर्थी का महत्व बढता जा रहा है और अब इस त्यौहार को देश के हर कोने मे मनाया जाता है। गणपति भगवान विघ्नहरता माने जाते हैं। लोग गणेश भगवान की मूर्ति को घरों व मन्दिरो मे भी स्थापित करते हैं और फिर कोई पांच दिन व कोई दस दिन बाद धूमधाम से इसका विसर्जन करते हैं।

पिछले कुछ वर्षों से मेरी भी आस्था इस त्यौहार मे बढती जा रही है। जैसे ही पास के मंदिर मे गणपति जी को स्थापित करने का जुलूस धूमधाम से निकलता है तो मानो मेरे कदम खुद ब खुद उनकी तरफ खिचे चले जाते हैं। पूरे हर्ष उल्लास के साथ उसमें शामिल होती हूँ। सच मे जो भक्त भगवान की स्थापना मे व्यस्त होते हैं उनकी श्रद्धा और सहयोग देखकर मन भाव विभोर हो जाता है।गणपति भगवान की वो बढी सी आलीशान मूर्ति को जिस प्यार और श्रद्धा के साथ स्थापित करते हैं तो यूं लगता है की मानो वो स्वयं ही आ के सामने बैठे हों।

जिस एहतियात के साथ उन्हें बिठाया जाता है तो लगता है कि वे आहत न हो जाएं। ढोल, नगाड़े, नृत्य व संगीत के साथ जब जुलूस आता है और मंदिर पहुंचता है तो मन उद्वेलित हो जाता है। फिर सभी रीति रिवाजों के साथ उनकी पूजा अर्चना करना, प्रेम भाव से मिलजुल मंदिर मे एक साथ भोजन करना और पांच दिन तक एक त्योहार का सा माहौल रहता है। शाम के समय की आरती, दिन मे किसी ने अलग से पूजा , हवन या यग्य करवाना हो, ये सब देखकर लगता है कि त्योहारों का मौसम आ गया। वैसे तो त्योहारों का मौसम रक्षाबंधन से शुरु हो जाता है किन्तु गणेश चतुर्थी की बढती रौनक का अपना ही आनंद है। जिस तरह से सब लोग शाम की आरती के बाद एक साथ खाना खाते हैं, तो लगता है की गणेश जी ने अपनी भक्ति व प्रेम के एक सूत्र मे सबको बांध दिया हो।

पांच दिन तक मंदिर मे कपूर व चन्दन की महक मन को मोहित करती है। रोज़ पुष्पों से सुशोभित गणपति भगवान के दर्शन करने जाती हूँ तो वापस आने का मन ही नहीं करता। ऐसा लगता है की सामने बैठे विघ्नहरता मेरे मन की सारी बातें सुन रहे हों। बस ऐसा लगता है की यूहीं बैठे उनसे बातें करती रहूं। मन मे उठते भावनाओं के समंदर को बस वे ही सुन व समझ सकते हैं। उस समय उनके सामने बैठे एक अजीब सी आत्मिक शांति मिलती है। गणपति चतुर्थी का हर साल खास इंतजा़र रहता है।

पांच दिनों के बाद जब विसर्जन का समय आता है तो मन भावुक सा हो जाता है। किन्तु जब सब एक साथ एक स्वर मे गाते हैं, “गणपति बाप्पा मोरेया, अगले बरस तु जल्दी आ”, तो मन मे एक नई आशा जागती है और खुद को सांतवना देती हूँ की अगले वर्ष प्रभु फिर आएंगे विघ्न हरने के लिए।

आप सभी को भी मेरी ओर से गणेश चतुर्थी की बहुत बहुत शुभकामनाएं।

This post was published on mycity4kids : https://www.mycity4kids.com/parenting/my-kids-my-wings/article/mere-vighnaharata-aura-mai-n

cover image: desicomments.com

Posted in हिन्दी, Blogs, parenting, Senior Citizens, Uncategorized

मेरी नानी की कहानी, मेरी मां की जु़बानी

यह कहानी मेरी नहीं, मेरी मां की है। आज की

इस कहानी में जज़्बात भी उनके हैं, और अल्फाज़ भी उनके।

इसलिए इस कहानी में मैंने कोई बदलाव नहीं किए। उम्मीद करती हूँ, आपको पसंद आएगी :

मेरी शादी हुई तो मुझे मां बाप से बिछड़ने का बहुत दुख था पर सुकून था कि मैं उसी शहर में हूँ तो आती जाती रहूंगी। मेरे पिताजी की सेहत ठीक नहीं रहती थी। हालांकि वो नौकरी भी करते थे। अच्छी पोस्ट पर भी थे, मेरी शादी के बाद मुझसे मिलने भी आते थे, मेरा कोई काम होता तो अवश्य करते।

कभी कभी जब मैं अकेले होती तो यह सोच कर घबरा जाती थी कि मेरे पिताजी की तबियत ठीक नहीं रहती। उनके बहुत करीब थी। उनकी याद आखोँ में आँसु ले आती। कुछ साल बाद, उनकी

तबियत और बिगड़ने लगी। अब मैं बैठे बैठे डर जाती कि अगर मेरे पिताजी को कुछ हो गया तो? मुझे लगता था कि मेरी दुनिया वहीं रुक जाएगी। और फिर दिन ….वही हुआ…

मेरे पिताजी दफ्तर गए और वहां उनकी तबीयत खराब हुई। उन्हें जल्द अस्पताल ले जाना पड़ा। शाम को अस्पताल से खबर मिली कि पिताजी मां को याद कर रहे हैं। मां उनसे मिलने अस्पताल गई। जब घर लौटी तो बोली, “मैं खाली हाथ आ गई”। मुझे समझ नहीं आया। तब पता चला कि मां को देखते ही पिताजी ने आखिरी सांस ली और चल बसे।

अब तक तो कुछ समझ नहीं आया। ऐसा झटका लगा कि बुद्धि ने काम करना बन्द कर दिया, किन्तु पिताजी की तेरहवीं पर जब मैंने मां को सीड़ियों से उतरते देखा तो एक मिनट के लिए सांस ही रुक गई। मैंने अपनी मां को सफेद साड़ी में बिल्कुल सादे और शांत रूप में देखा। मुझे जीवन का सबसे बड़ा झटका लगा जब मैने अपनी मां को इस रुप मे देखा। तब असली एहसास हुआ कि पिताजी नहीं रहे। मैं रो रो कर बेहाल थी। बस चिल्लाई जा रही थी, “यह ठीक नहीं हुआ, यह ठीक नहीं हुआ”

उस वक्त मां ने ही मुझे सम्भाला, बोली “यही जीवन की सच्चाई है इसे जितनी जल्दी समझ लेंगे उतना ही हम लोगों के लिए अच्छा है”।

मैं अपनी मां का वो शांत रुप देख कर बिल्कुल स्तब्ध थी किन्तु मुझे शक्ति भी मिली। जीवन की सबसे कड़वी सच्चाई का मां ने इतने सहज रुप से स्वीकार किया। मुझे अपनी मां पर गर्व भी हो रहा था। मेरी मां स्कूल में अध्यापिका थी और हम पांच बहने। पिताजी की मृत्यु के समय दो की शादी हुई थी और बाकियो की होनी थी। एक छोटी बहन तो बहुत ही छोटी थी। शायद उनको देखकर मां ने संयम रखा होगा। मां ने हिम्मत के साथ मेरी दोनों छोटी बहनों को पढा लिखा कर उनका ब्याह किया। मुझे आज भी याद है, सबसे छोटी बहन के ब्याह के बाद मेरी मां पहली बार रोई थी कि सब मुझे छोड़ कर चले गए। उनका मतलब पिताजी से था। तब मुझे लगा कि मां ने कितने सालों तक वह दर्द अपने अन्दर छुपा कर रखा था ताकि उसकी बेटियाँ कमजो़र ना बनें।

आज भी मां की वो सीख याद है, “जीवन की कड़वी सच्चाईयों का सामना हिम्मत से करना चाहिए। जि़दगी तो चलती ही रहेगी। हिम्मत रखेंगे तो बड़ी से बड़ी जि़म्मेदारी भी निभा पाएंगे”। मुझे एक बात का एहसास भी हुआ कि मंजिल पर पहुंच कर ही थकान का एहसास होता है, और कहीं ना कहीं यह खुशी भी होती है कि हमने अपनी जि़म्मेदारियां अच्छे से निभाई।

यही है मां की सीख- तकलीफ मे घबराना नहीं चाहिए, हिम्मत से काम लेना चाहिए। सब समस्याएं समय के साथ हल हो जाती हैं।  

 

This post was published on mycity4kids : https://www.mycity4kids.com/parenting/my-kids-my-wings/article/meri-nani-ki-kahani-meri-ma-n-ki-jubani

Posted in हिन्दी, Blogs, Life style, Social Responsibilty, Uncategorized

सास बहु कैसे बने सहेली, रिश्तों की सबसे बड़ी पहेली

सभी रिश्तों में सबसे उलझा एवं मुश्किल रिश्ता होता है सास बहु का। दो औरतें जब बहनें हों, मित्र हों, पार्क में रोज़ मिलती हों; एक प्यारा सा रिश्ता अकसर बनाने में सफल हो जाती हैं। पर न जाने क्यूँ जब वे सास बहु बनती हैं तो चाहते हुए भी वैसा रिश्ता नहीं बना पाती।

आज कल सास बहु का रिश्ता काफी बदल रहा है किन्तु अभी भी कहीं बहु के मन में और कहीं सास के मन में एक उम्मीद बनी रहती है कि काश हमारी बहु बेटी की तरह होती। कहते हैं कि ताली दोनों हाथों से बजती है, यह सच है। जब तक दोनों अपना हाथ आगे नहीं बढाएंगी तब तक ताली नहीं बजेगी और दोनों सहेली नहीं बन पाएगी।

23-1445599987-motherinlawday

इसके कुछ कारण जो मैं समझती हूं वो है –

1. इसका पहला कारण है कि दोनों एक दूसरे को समझ नहीं पाती। मां अपने बच्चे को शुरु से ही देखती आ रही है इसलिए वह उसकी अच्छाई व बुराई सब समझ पाती है। सास बहु का रिश्ता एक दम नया होता है, इसलिये समय तो देना चाहिए।

2. दो घरों की विविधता इस रिश्ते में कठिनाई का कारण बनती हैं, चाहे वह समान धर्म के लोग हों या अलग धर्म के। पौधे का हवा पानी बदलता है तो वो मुरझा जाता है। एक नव विवाहिता भी उसी पौधे के समान होती है।

3. उम्र का फर्क भी बहुत मायने रखता है। बड़े लोग आसानी से अपने आप को बदल नहीं पाते और उनमें एक आधिपत्य की भावना होती है, फिर वह मां ही क्यों न हो। ऐसे में बहु की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बहु को थोड़ा समझना चाहिए।

4. अहम को छोड़ देना चाहिए। जब तक “मैं” रहेगी, चाहे वह सास मे हो या बहु मे, रिश्ता कभी नहीं बन पाएगा। एक ने कही दूसरे ने मानी, इसी का नाम बुद्धिमानी। किन्तु कोई ज़रूरी नहीं कि हर बार न चाहते हुए भी हां करें। चार बार कहना मानें तो एक बार नहीं भी मानेंगे तो चलेगा।

5. बच्चों से सीखना चाहिए। अभी झगड़ा हुआ और अभी मेल मिलाप हो गया। कभी किसी बात पर वाद विवाद हो भी जाए तो उसको भूलना ही बेहतर है। यदी उस झगड़े को लेकर आगे बढेंगे तो कभी दोस्त नहीं बन पाएंगे।

6. किसी भी रिश्ते में मर्यादा का ध्यान रखना ज़रूरी होता है। हर व्यक्ति का अपना द्रष्टिकोण होता है। उसके द्रष्टिकोण को भी उतनी ही एहमियत देनी चाहिए जितनी स्वयं को। झुकने मे कोई व्यक्ति छोटा नहीं हो जाता।

7. अपनी गलतियों को भी देखना व पहचानना चाहिए और सुधारना चाहिए और जितनी जल्दी हो सके माफी मांगना चाहिए।

8. किसी भी रिश्ते मे 100 प्रतिशत तो नहीं मिलते। इसलिए यदि जो हमारी ओर से 50% है, यदि हम वो सारा दे दें तो दूसरी ओर से 25% तो मिल ही जाएगा। 75% अच्छा होने से वह रिश्ता अच्छा ही होता है।

9. सास , बहु और वो। यह वो हर जगह परेशान करता है। पति, पत्नी और वो के रिश्ते की तरह इस रिश्ते में भी कोई तीसरा आए, चाहे वो कोई भी हो तो मन मुटाव बढ़ जाता है। किसी दूसरे की बात पर ध्यान न देकर आपसी मत भेद को आपस मे ही मिटाए तो अच्छा रहता है। फोन पर कभी सास अपनी बेटी से या बहु नी मां से अगर एक दूसरे की बुराई करें तो वह भी दरार का कारण बनती है। यहां तक कि पति और ससुर को भी इस रिश्ते से दूर रखना चाहिए।

10. बहु की बेटी से या दूसरे कि बहुओं से और सास की मां से या फिर दूसरे की सास से तुलना न करें। आशाएं न रखें। किसी ने कुछ कर दिया तो भी अच्छा और अगर न किया तो भी अच्छा। उनकी क्षमता को देखते हुए व्यवहार करना चाहिए। क्षमता से बाहर तो मां भी अपनी बेटी को मना कर देती है। यदि मां डांटें तो कोई बात नहीं और यदि सास ने कुछ कहा तो मुहल्ले मे ढिंढोरा पीट दिया, ऐसा भी नहीं होना चाहिए।

जानती हूँ कि कहना आसान होता है पर करना मुश्किल, फिर भी कोशिश तो करी जा सकती है आखिर घर भी हमारा है और रिश्ते भी। और वैसे भी, तोड़ने से बेहतर तो जोड़ना ही है।

Posted in हिन्दी, Blogs, Children, parenting, Uncategorized

बच्चों की छुट्टियां और मायका

बच्चों की छुट्टियों और मायके का आपस में बहुत गहरा सम्बन्ध है। जिनके मायके उन्हीं के शहर में होते हैं उनको तो शायद इस बात से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता पर जिनके मायके दूसरे शहर में होते हैं, वे सारा साल इंतजार करती हैं। जैसे ही बच्चों की छुट्टियां होंगी एक ही वाक्य दोहराया जाता है कि हम तो सारा साल अपने मायके नहीं जा पाती कम से कम छुट्टियों में तो एक महीना चैन से अपने मायके रहेंगे। मां के लिए तो ठीक है मायके गई और निश्चिंत हो गई कि नाना नानी बच्चे सम्भालेंगे और हमारी छुट्टी। बच्चों से ज्यादा मां को लगता है की हमारी छुट्टियां हैं। एक हद तक तो ठीक है कि मां को भी कुछ आराम चाहिए किन्तु बच्चों के शौक का भी ख्याल रखना ज़रूरी है। बच्चे तो कई बार वहाँ भी बोर हो जाते हैं।उनके लिए जैसे अपना घरवैसे ही नाना नानी का घर।

पहले बड़े और संयुक्त परिवार होते थे। घरों में बहुत से बच्चे होते थे और बच्चे भी ननिहाल जाना पसंद करते थे। आजकल बच्चों से ननिहाल जाने की बात करो तो एक दो दिन तो खुश रहते हैं पर फिर वही ढाक के तीन पात। इस बार मैने सोचा कि बच्चे भी बोर न हों और मुझे भी आराम मिले। काफी सोच विचार के बाद छुट्टियों का कार्यक्रम कुछ इस तरह तय किया –

1. पहले एक हफ्ता तो घर पर ही आराम किया। स्कूल के व्यस्त कार्यक्रम से आजादी जो मिली थी। साथ ही साथ गृहकार्य भी शुरु कराया। यह तय किया गया कि थोड़ा थोड़ा करके गृहकार्य खत्म करें।

2. जब मायके गई तो पड़ोस में आई अपनी मित्र के बच्चों को बुलाया और उनके साथ मिलकर पिट्ठू , पकड़न पकड़ाई व छुपन छुपाई के खेल खेले। बच्चों ने मिलकर खूब हुड़दंग किया और बड़े भी उन्हें देखकर बहुत खुश हुए।

IMG_1677

3. बच्चों को रचनात्मकता बहुत लुभाती है। बाज़ार से लाए खिलौने उन्हें कुछ दिन ही भाते हैं, इस बार बच्चों के साथ मिलकर गिट्टे व पिट्ठू खुद बनाए। खुद के बनाए खिलौनों से खेलने का उत्साह ही कुछ और था।

4. घर मे तरणताल बनाने वाले खिलौने ला कर, उनमें साबुन की झाग बनाकर बच्चों को खूब खिलाया। बच्चों के साथ साथ मैने भी खूब मस्ती की।

IMG_1679

5. शाम के समय उन्हें अन्य खेल क्रिड़ा के लिए खेल परिसर ले कर गई। आजकल खेल परिसर में कई खेल सुविधाएं उपलब्ध हैं। इनसे बच्चों का मनोरंजन भी होता है साथ ही साथ स्वास्थ्य भी बनता है। बच्चों के साथ साथ हम भी खेले, मनोरंजन के साथ व्यायाम भी, एक पंथ तीन काज।

6. एक हफ्ता शहर से बाहर बिताने का कार्यक्रम भी रखा। बच्चे इस बात से बेहद खुश थे की मम्मी पापा हमारे साथ वक्त बिता रहें हैं। यह सप्ताह साल का सबसे यादगार सप्ताह रहता हैं। वरना कभी मम्मी पापा व्यस्त तो कभी बच्चे अपनी पढाई से व्यस्त।

7. एक हफ्ता दादा दादी के घर ले कर गई। दादा दादी के लाड प्यार के बिना भला छुट्टियों का मजा ही क्या।

मैने तो इन सब प्रयासों द्वारा बच्चों की छुट्टियां यादगार बनाने की कोशिश की। आशा है आपको अच्छे लगे। आप अपने अनुभव भी ज़रूर बताइएगा।

Posted in हिन्दी, Blogs, Reviews, Sponsored Stories, Uncategorized

एक माँ की शंका, एक माँ का भरोसा

 

 

माँ बनना एक अलग ही एहसास है। बहुत सी भावनाएँ, बहुत सी शँकाएं और बहुत सारी खुशियों से जैसे मन भर सा जाता है। हर दिन कुछ नए भाव, कुछ नए विचार और कुछ नए सपनों के बारे में सोचती हुई, एक औरत अपने आने वाले बच्चे कि तैयारियाँ करती है।

 

हर औरत की तरह मैं भी अपने होने वाले बच्चे के लिए बहुत उत्साहित थी। जब खाना खाने लगती, तब सोचती क्या जो मैं खाने जा रही हूँ, वो मेरे बच्चे के लिए सही है? सीड़ियाँ चड़ते व उतरते समय, खास सावधानी बर्तना। हर कदम बहुत सावधानी से रखना। सब कुछ अब बहुत अलग व नया सा लगता था। पहले बाज़ार जाने पर अपने लिए कुछ नई वस्तु तुरंत भा जाती थी, पर अब बाज़ार जाने पर अपने बच्चे के लिए कुछ लेने का मन करता था।

 

एक दिन मेरी माँ मुझे बता रहीं थी कि कैसे मेरे होने के समय, उन्होने सारी तैयारियाँ खुद  थीं। अपने बच्चों के कपड़े वे खुद सिलती, स्वेटर भी वे खुद ही बुनती, लंगोट भी वे खुद ही बनाती थी। उनकी ये बातें सुनकर दिल भाव विभोर हो उठा। मेरे भी दिल में आया कि मैं भी अपने बच्चे के लिए करूं कुछ खास। आखिर इसी को तो ममता कहते हैं।

 

बाज़ार से बहुत सामान लिया, पर फिर भी मन में था कि कुछ खुद भी बनाऊँ। फिर क्या था , कपड़ा, फोम, मलमल, इत्यादि , सभी कुछ ले आई। और खुद ही अपने हाथों से बिछौने व लंगोट बनाए।

 

इस सभी उत्साह के बीच, कुछ शंकाए भी दिल में उठने लगी। क्या ये सभी वस्तुएं साफ एवं स्वच्छ हैं? किसी ने सलाह दी कि बच्चे के कपड़ो को अच्छे से धो कर धूप में सुखाने चाहिए, पर मुझे लगा की क्या सिर्फ धोना ही काफी होगा? जब बात संपूर्ण स्वच्छता व बच्चे की सुरक्षा की हो तो सिर्फ एक ही नाम याद आया: डेटोल।

 

सभी ने कहा कि झुकने का काम हम तुम्हें नही करने देंगे।  तब सासू माँ व ससुर जी आगे आए। दादी दादा जो बनने वाले थे। बच्चे के सभी लंगोट, बिछौने व कपड़े डेटोल में भिगो कर धोए गए। तब मन संतुष्ट हुआ।

 

फिर वो दिन आया। मेरी नन्ही परी का जन्म हुआ। घर खुशियों से भर गया। आज भी उसकी स्वच्छता व सुरक्षा के लिए डेटोल का सैनिटाइज़र व हाथ धोने का लिक्विड उसके बस्ते में हमेशा रखती हूँ।

 

कुछ दिन पूर्व, mycity4kids और डेटोल के सहयोग से हुई मुलाकात में डाक्टर वज़ीर ने नवजात शिशुओं की स्वच्छता की एहमियत बताई तब लगा कि उस वक्त की मेरी शंकाए गलत न थी। डाक्टर ने बताया कि घर में किसी को ज़ुकाम, खाँसी कि शिकायत हो तो वे नवजात शिशु को न छुएं। शिशु को उठाने से पूर्व हाथ अवश्य धोंए। सभी मेहमानों के लिए भी ज़रूरी है कि बच्चे को हाथ लगाने से पूर्व हाथों की स्वच्छता का ध्यान रखें।

 

अंत में बस इतना ही कहना चाहूंगी कि एक मां की शंका और एक माँ का भरोसा कभी गलत नही होता। इसी सिलसिले में एक चलचित्र दिखाना चाहूँगी, ज़रूर देखियेगा।

 

Posted in हिन्दी, Blogs, parenting, Social Responsibilty

ये कैसी माँ है 

माँ एक बहुत ही महान शब्द है। इस एक शब्द में सारी सृष्टी बसी है। माँ बनना एक औरत के लिए बहुत सम्मान की बात होती है। माँ बनते ही एक औरत की ममता कब और कैसे जागृत होती है, पता ही नही चलता। इतनी दर्द सहने के बाद बच्चे का चहरा सामने आते ही वह सब भूल जाती है। उसका जीवन बच्चों के इर्द गिर्द ही घूमता रहता है। और वह स्वाभाविक ही है। बच्चा माँ का अभिन्न अंग होता है। माँ अपने बच्चे को कभी दुखी नही देख सकती। दिन रात बस इसी सोच में रहती है कि कैसे अपने बच्चे के खाने, कपड़े व पढ़ाई का ध्यान रखूं। गरीब हो या अमीर, हर माँ अपनी ताकत के हिसाब से, बच्चों का ख्याल रखती है।
किन्तु यह कैसी माँ है? पिछले दिनों ऐसी खबरें सुनने को आई कि विश्वास करने का मन नही हुआ। भिखारियों को तो देखा था अपने बच्चों से भीख मंगवाते पर पढ़ी लिखी औरतें भी अपने बच्चों के साथ ऐसा करें तो!
क्या कोई मां इतनी लापरवाह हो सकती है? रोहिनी में जुड़वा बच्चों के साथ हुआ हादसा बेहद दर्दनाक है। क्या कोई माँ छोटे बच्चों को घर में अकेला खेलते हुए छोड़ कर जा सकती है? कपड़े धोने की मशीन में पानी भर कर बाज़ार से सर्फ लेने चली जाती है और वह भी बाथरूम का दरवाज़ा खुला छोड़ कर? अपनी इतनी लापरवाही की वजह से उसे अपने दोनो जुड़वा बच्चों की जान से हाथ धोना पड़ा। ऊपर से बच्चों को बाहर जा कर ढूंढने लगी।
हम सब ये मानते हैं कि आज की ज़िंदगी में बहुत जद्दोजहद है। एक ही समय पर कई काम करने पड़ते हैं परंतु बच्चों के साथ तो लापरवाही की गुंजाइश ही नही हो सकती।
कुछ दिन पहले, एक और खबर पढ़ी। एक माँ अपने बच्चे को पीट पीट कर सीड़ियों से गिरा देती है। क्या इतना गुस्सा सही है? क्या इस तरह अपनी निराशा बच्चों पर निकालना सही है?
इसमें मासूम बच्चे का क्या दोष, उसे तो आपने ही जन्म दिया है। बच्चे तो कोमल पौधे की तरह होते हैं जिन्हें प्यार से सींचना होता है।
डाक्टर इसे मानसिक बिमारी कहते हैं। अगर ऐसा है तो बच्चों के पिता का फर्ज़ है कि माँ का ख्याल रखे व उसकी मदद करे।
ये कैसी माँ है जो गर्म पानी से भरी बाल्टी बाथरुम में रख कर रसोई में खाना बनाने चली जाती है। ये जानते हुए भी कि नन्हें बच्चे जाने कब कौन सी शरारत कर बैठे। इसका परिणाम वह भुगतती भी है। जब उसका अबोध बालक अनजाने में उस बाल्टी में गिर कर अपनी जान गंवा बैठा।
एक माँ को अपने बच्चे के साथ तब तक हर कदम पर साथ रहना चाहिए जब तक वे सही व गलत की परख न सीख जाएं।

Posted in हिन्दी, Poetry, Uncategorized

​औरत तेरी यही कहानी

औरत तेरी यही कहानी, 

हर रिश्ता माँगे कुरबानी,

दिल का दर्द सहे छुप छुप के,

आँसु पोंछ अपने आँचल से,  

कहे, ‘ कुछ नही, था वो पानी’
औरत तेरी यही कहानी,

भावुक होकर युं पल भर में,

मिटा दे अपनी ही ज़िदगानी,

माँ बाप के घर की रोशनी,

ससुराल में जलती जाती,

मिटा के अपनी खुशियाँ सारी,

दूजों की झोली भरती जाती,
औरत तेरी यही कहानी,

बन कली जो खिली इक बगिया में,

बन फूल हर कदम कुचली जाती,

राजकुमारी जैसे जीती बचपन में,

पल भर में बन जाती दासी,

दुख से भरी हो जिसकी जीवनी,

खुशियाँ दर दर वो बिखराती,
औरत तेरी यही कहानी,

पँछि बन उड़ने की चाहत, 

खुला आकाश छूने की ख्वाहिश,

काश जी सकती अपने सपने,

कटे न होते तेरे ये पर,

बन पतंग हवाओं से बतियाती,

गर डोर तेरी न काटी जाती,
औरत तेरी यही कहानी,

बस पिंजरे में सिसकी भरती,

सहना सब पर कहना न कुछ,

न थकना, न हताश होना,

न मुस्कान का कम होना,

दुखोंमें अपने सुख को ढूंढना,

दिल की गागर में सागर होना,
औरत तेरी यही कहानी,

न माँ, न मायका अपना,

ससुराल भी पराया होता,

पति के चरणों के धूल की भांति,

क्या कभी तू भी समझी जाती,

किस कोने में घर है तेरा,

ये जग तो पल भर का डेरा,
औरत तेरी यही कहानी,

ना तेरी हाँ समझी जाती,

चुप्पी तेरी सहमती जताती,

आखिर में तेरी बारी आती,

मान नही, अभिमान नही,

तेरा कभी सम्मान नही,

बस मर्यादा में फंस जाती,
औरत तेरी यही कहानी,

दुख की कलम से लिखी जाती,

दर्द भरी स्याहि से,

आँसुओं के पन्ने में समाती,

जो चाहे वो कभी न पाती,

अपने मन की कह न पाती,

बस चुपचाप ही सहती जाती,
औरत तेरी यही कहानी,

सहनशीलता की निशानी,

चुप्पी तोड़, अब कह दे सब कुछ,

आँसु पोंछ कर हँस दे अब बस,

और नही, अब और नही,

दुख भरी ये दास्तान और नही,

खुशियों की कलम से लिख दे अब,

सुख परिपूर्ण इक नई कहानी।
औरत तेरी यही कहानी, 

हर रिश्ता माँगे कुरबानी,

दिल का दर्द सहे छुप छुप के,

आँसु पोंछ अपने आँचल से,  

कहे, ‘ कुछ नही, था वो पानी’।

Posted in हिन्दी, Blogs, Poetry

नारी है सम्मान की अधिकारी

नारी का करो सम्मान,

नारी है जीवन का आधार,

सुखद होगा तभी समाज,

जब पाएगी नारी समान अधिकार,

बन बेटी जब वो घर आए,

घर मे सुख शाँति लहराए,

खिलखिलाती प्यार फैलाए,

फिर भी अभिमान एक बेटा पाए,

लेकर बस्ता स्कूल वह जाए,

माँ बाप का सर गर्वित करवाए,

बने वकील, डाक्टर, अधिकारी,

सर्व सम्पन्न है आज की नारी,

बहु बने औऱ बने माँ जब,

त्याग की मूरत, ममता की सूरत,

घर बन जाए उसका सँसार,

फिर भी ना पाए अपना अधिकार,

नारी को गर मिले सम्मान,

पर्गति करे सारा समाज,

जो सुख शाँति घर मे आए,

वही सारे जग मे लहराए।